गुरु अर्जुन देव जी को 30 मई 1606 को शहीदी प्राप्त हुई थी। गुरु अर्जुन देव जी सिखो के पांचवे गुरु है उनके शहीदी दिवस को "शहीदी गुरपर्व" भी कहा जाता है।

उन्होंने अपनी शहीदी के पहले ही प्रेरणा दी कि सिखों को अपनी धर्मनिरपेक्षता का पालन करना चाहिए , उनकी शहादत सिख समुदाय में बड़े धार्मिक और सामाजिक परिवर्तन का कारण बनी।

उन्होंने बहुत से धार्मिक ग्रंथों को संग्रह किया, जिनमें रागमाला, निरुक्त, बानी भाग का संग्रह और बहुत कुछ शामिल था। उन्होंने सिख समुदाय में एकता और सदभाव को स्थापित किया, जिससे सिख धर्म की मजबूती और विश्वास प्रतीत हुआ।

गुरु अर्जुन देव जी ने आत्मा की महत्ता को समझाया और सिखों को जीवन और मृत्यु के मामलों में सहायता प्रदान की। उन्होंने अपनी शहीदी के दौरान शांति और सहिष्णुता का परिचय दिया, जिसे सिख धर्म के मूलभूत सिद्धांतों में शामिल किया गया।

गुरु अर्जुन देव जी ने सिख धर्म में संगठनशीलता का आदान किया और सिखों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से मजबूत बनाया। उन्होंने सिखों को धार्मिक सहिष्णुता का संदेश दिया, जिसका मतलब है कि सभी लोगों को एक साथ रहना और समान अवसर मिलना चाहिए।

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