निर्जला एकादशी का व्रत हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। यह व्रत हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण माना जाता है।इस साल निर्जला एकादशी 31 मई को है।

निर्जला एकादशी एक अत्यधिक तपस्यात्मक व्रत है जिसमें व्रती पूरे दिन बिना पानी पीये रहते हैं। निर्जला एकादशी के दिन व्रती अन्न, पानी, दूध, दही, तेल, नमक, लहसुन, प्याज़, गोंद, धनिया, इमली, लीटरी, गेंदा आदि की चीजें भी नहीं खाते हैं।

निर्जला एकादशी के दिन व्रती के सिर पर धूप नहीं लगाई जाती है, क्योंकि धूप भी पानी की तरह मानी जाती है।इस एकादशी का व्रत करने वालों को अगले साल की सभी अपराधों के प्रायश्चित्त का फल मिलता है, जिससे उनकी पापों का नाश होता है।

निर्जला एकादशी का व्रत रखने से मान्यता है कि व्रती के साथी उसके पाप और दुष्कर्मों के भाग्य को भी धो देते हैं। इस एकादशी के दिन व्रती अगले जन्म में निर्जला महीने में जन्म लेते हैं, जिससे उनके पूरे परिवार को धान्य और सुख का आनंद मिलता है।

निर्जला एकादशी को रखने से व्रती को स्वर्ग के सभी आनंदों का अनुभव होता है और वह स्वर्गीय लोकों में आत्माओं को मोक्ष प्राप्त कराते हैं। निर्जला एकादशी के दिन व्रती को ब्रह्मा, विष्णु और शिव की अराधना करनी चाहिए, जिससे उन्हें त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

निर्जला एकादशी को रखने से व्रती की आत्मा की मुक्ति होती है और वह ब्रह्मलोक में विश्राम प्राप्त करती है। निर्जला एकादशी के दिन व्रती को संसार में चार धामों की यात्रा करनी चाहिए, जिससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

निर्जला एकादशी के दिन व्रती को अपने पूर्वजों को श्राद्ध करने का अवसर मिलता है और वह उनकी आत्माओं को शांति प्रदान करते हैं।

निर्जला एकादशी के दिन व्रती को स्वर्गीय देवताओं की कृपा प्राप्त होती है और वे स्वर्ग में अपने पूरे परिवार के साथ निवास करते हैं।